सोमवार 22 जून 2026 - 21:25
“मिस्ली ला युबायेओ मिस्लहु” — क्या यह इमाम हुसैन (अ) का शख़्सी बयान था या अहलेबैत-ए-नबूवत का अबदी मौक़िफ़?

इस्लामी इतिहास में कुछ ऐसे कथन पाए जाते हैं जो किसी विशेष समय, स्थान या व्यक्ति की सीमाओं से ऊपर उठकर एक स्थायी घोषणा और शाश्वत मापदंड का रूप ले लेते हैं। इन्हीं में सय्यद उश शोहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का वह महान और विचारोत्तेजक कथन भी शामिल है: «मिस्ली ला युबायेओ मिस्लहु» — “मेरे जैसा व्यक्ति, उसके जैसे व्यक्ति की बैअत नहीं करता।”

लेखकः मौलाना तक़ी अब्बास कलकत्तवी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी !

प्रस्तावना

इस्लाम के इतिहास में कुछ ऐसे कथन पाए जाते हैं जो किसी विशेष समय, स्थान या व्यक्ति की सीमाओं से ऊपर उठकर एक स्थायी संविधान और शाश्वत मानक बन जाते हैं। इन्हीं में सय्यद उश-शोहदा इमाम हुसैन (अ) का यह महान और विचारोत्तेजक कथन शामिल है:

“मिस्ली ला युबायेओ मिस्लहु”
“मेरे जैसा, उसके जैसे की बैअत नहीं करता।”

दिखने में यह एक छोटा सा वाक्य है, लेकिन इसके भीतर ज्ञान, सत्य और विचारों का एक विशाल संसार छिपा हुआ है। अफसोस कि इस वाक्य को अक्सर केवल एक व्यक्तिगत या ऐतिहासिक प्रतिक्रिया के रूप में समझा गया है, मानो इमाम हुसैन (अ) सिर्फ यह कह रहे हों कि मैं यज़ीद की बैअत नहीं करूंगा, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है।

यदि इमाम (अ) का उद्देश्य केवल अपनी और यज़ीद की व्यक्तिगत तुलना होता, तो वे कहते:

“अना ला योबायेओ यज़ीद, मैं यज़ीद की बैअत नहीं करता”

लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं कहा, बल्कि एक व्यापक, सार्वभौमिक और अबदी अभिव्यक्ति अपनाई:

“मिस्ली ला युबायेओ मिस्लहु”

अर्थात यह मामला केवल दो व्यक्तियों के बीच का विवाद नहीं, बल्कि दो विपरीत वास्तविकताओं, दो टकराती विचारधाराओं और दो अलग-अलग सभ्यताओं का संघर्ष है।

“मिस्ली” की व्याख्या स्वयं इमाम हुसैन (अ) के शब्दों में

जब वलीद बिन उत्बा, यज़ीद के आदेश पर इमाम हुसैन (अ) से बैअत लेने आया, तो इमाम (अ) ने फरमाया:

“हम अहलेबैत-ए-नबूवत हैं, रिसालत का खज़ाना हैं, फरिश्तों के उतरने का केंद्र हैं, हमारे माध्यम से अल्लाह ने शुरुआत की और हमारे माध्यम से ही समाप्त करेगा, और यज़ीद एक फासिक व्यक्ति है, शराब पीने वाला, नाजायज़ हत्या करने वाला और खुलेआम फिस्क करने वाला है, और मेरे जैसा उसके जैसे की बैअत नहीं करता।”

इस उत्तर में वास्तव में इमाम (अ) ने स्वयं “मिस्ली” और “मिस्लहु” की व्याख्या कर दी।

“मिस्ली” केवल हुसैन बिन अली (अ) की व्यक्तिगत पहचान नहीं है, बल्कि अहलेबैत-ए-नबूवत, रिसालत का स्रोत, फरिश्तों के उतरने का केंद्र और दीन-ए-इलाही के संरक्षक हैं।

इसी प्रकार “मिस्लहु” केवल यज़ीद बिन मुआविया का नाम नहीं है, बल्कि हर वह शक्ति जो फिस्क, ज़ुल्म, अत्याचार, दीन की विकृति, जब्र और तानाशाही सत्ता का प्रतिनिधित्व करती है, वह इसके दायरे में आती है।

पहला अध्याय

“मिस्ली” से तात्पर्य कौन?

कुछ विद्वानों ने “मिस्ली” से हर उस व्यक्ति को लिया है जो स्वतंत्रता, सम्मान और सत्य की रक्षा करने वाला हो। यह अर्थ अपने स्थान पर सही है, लेकिन एक अधिक गहरी व्याख्या यह है कि “मिस्ली” से तात्पर्य वे नूरानी हस्तियाँ हैं जो इस्मत, ज्ञान और हिदायत में इमाम हुसैन (अ) के समान हैं; यानी अन्य इमाम-ए-अहलेबैत (अ)।

इसी लिए इमाम (अ) ने यह नहीं कहा कि “हुसैन यज़ीद की बैअत नहीं करेगा”, बल्कि कहा:

“मिस्ली ला युबायेओ मिस्लहु”

अर्थात यदि अमीरुल मोमिनीन अली (अ), इमाम हसन (अ) या अन्य इमाम भी इन्हीं परिस्थितियों में होते, तो उनका भी वही रुख होता, क्योंकि उनका नूर एक है, उनका लक्ष्य एक है और उनकी रज़ा केवल अल्लाह की रज़ा है।

अमीरुल मोमिनीन अली (अ) फरमाते हैं:

“नहनो शजरतुन नबुव्वते व मआदेनुल इल्मे व योनाबीउल हुक्मे, हम नबूवत का वृक्ष हैं, ज्ञान के स्रोत हैं और हिकमत के झरने हैं।”

इमाम रज़ा (अ.स.) फरमाते हैं:

“नहनो हुजजुल्लाहे फ़ी ख़ल्के ... व नहनो कल्मतुत तक़वा वल उरवतुल वुस्क़ा, हम अल्लाह की हुज्जतें हैं… हम तक़वा का कलिमा और मजबूत रस्सी हैं।”

इसलिए कर्बला में उठने वाली आवाज़ केवल हुसैन (अ) की आवाज़ नहीं थी, बल्कि रसूलुल्लाह(स), अली (अ), हसन (अ) और सभी इमाम-ए-अहलेबैत (अ) के संयुक्त दृष्टिकोण की आवाज़ थी।

बैअत से इनकार: क्या यह राजनीतिक मतभेद था या एक इलाही रुख?

कुछ लोग यह समझते हैं कि इमाम हुसैन (अ) और यज़ीद के बीच का संघर्ष केवल सत्ता या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मामला था, जबकि इमाम (अ) के कथन इस सोच की पूरी तरह नफ़ी करते हैं।

इमाम (अ) ने यज़ीद के व्यक्ति के मुकाबले में अपनी व्यक्तिगत पहचान को नहीं रखा, बल्कि एक ओर अहलेबैत-ए-नबूवत और दूसरी ओर फिस्क व फुजूर के पूरे सिस्टम को सामने रखा।

इसलिए बैअत से इनकार किसी सत्ता को पाने के लिए नहीं था, बल्कि दीन की हिफाज़त, उम्मत को जागरूक करने और हक़ और बातिल के बीच स्पष्ट सीमा स्थापित करने के लिए था।

अगर कर्बला न होती तो?

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण और विचार योग्य है कि यदि इमाम हुसैन (अ) कर्बला न जाते या परिस्थितियाँ अलग होतीं, तो क्या वे यज़ीद की बैअत कर लेते?

इसका उत्तर स्वयं इमाम (अ) के कथन में मौजूद है।

इमाम (अ) ने यह नहीं कहा कि “मैं उस समय या उन परिस्थितियों में बैअत नहीं करता”, बल्कि उन्होंने फरमाया:

“मिस्ली ला युबायेओ मिस्लहु”

अर्थात यह कोई अस्थायी या भौगोलिक निर्णय नहीं, बल्कि एक सिद्धांतात्मक और शाश्वत रुख है।

इसका अर्थ यह है कि यदि कर्बला न भी होती, स्थान बदल जाता या समय बदल जाता, तब भी हक़ और बातिल के बीच कोई समझौता नहीं होता, क्योंकि नूर और ज़ुल्मत कभी एक साथ नहीं रह सकते।

इसी प्रकार यदि अमीरुल मोमिनीन अली (अ), इमाम हसन (अ), इमाम सज्जाद (अ) या अन्य मासूम इमाम भी ऐसे ही हालात में होते, तो उनका रुख भी यही होता, क्योंकि अहलेबैत की हकीकत एक है, उनका मिशन एक है और उनका लक्ष्य एक है।

दूसरा अध्याय

“मिस्लहु” से मुराद कौन?

यज़ीद एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार, एक व्यवस्था और एक शासन-प्रणाली का नाम है

इमाम हुसैन (अ) के ऐतिहासिक कथन “मिस्ली ला युबायेओ मिस्लहु” में जितनी अहमियत “मिस्ली” की है, उतनी ही महत्वपूर्ण और विचारणीय “मिस्लहु” भी है। क्योंकि जब तक “मिस्लहु” की वास्तविकता स्पष्ट न हो, इस महान घोषणा की व्यापकता और शाश्वतता पूरी तरह समझ में नहीं आ सकती।

बाहरी रूप से “मिस्लहु” का उदाहरण यज़ीद बिन मुआविया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इमाम हुसैन (अ) का इनकार केवल यज़ीद नाम के व्यक्ति के खिलाफ था, या उससे आगे बढ़कर यह एक विचार, एक व्यवस्था और एक अत्याचारी शासन-प्रणाली के खिलाफ था?

इमाम (अ) के अपने कथन इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। जब वलीद बिन उत्बा ने यज़ीद की बैअत का आग्रह किया, तो इमाम (अ) ने फरमाया:

“व यज़ीदो रजलुन फ़ासेक़ुन, शारेबुल खमरे, क़ातेलुन नफ़सिल मोहर्रमते, मोअलेनुन बिल फ़िस्क़े, और यज़ीद एक फासिक व्यक्ति है, शराब पीने वाला है, सम्मानित जीवन का हत्यारा है, और खुलेआम फिस्क का प्रचार करने वाला है।”

इस कथन में इमाम (अ) ने यज़ीद की नस्ल, परिवार या व्यक्तिगत दुश्मनी को मुद्दा नहीं बनाया, बल्कि उसकी विशेषताओं को बयान किया।

अर्थात मामला यज़ीद की व्यक्तिगत पहचान का नहीं, बल्कि फिस्क, ज़ुल्म, तानाशाही, दीन की विकृति, नाहक़ हत्या और खुले पाप पर आधारित शासन का है।

इस दृष्टि से “मिस्लहु” किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक विचार का नाम है।

यज़ीदियत: एक स्थायी विचलन

यदि यज़ीद केवल एक व्यक्ति का नाम होता, तो उसकी मृत्यु के साथ यज़ीदियत भी समाप्त हो जाती, लेकिन इतिहास इस बात का साक्षी है कि ज़ुल्म, तानाशाही, दीन की विकृति और सत्ता-लोलुपता विभिन्न रूपों में हमेशा मौजूद रही है।

बनी उमय्या के बाद बनी अब्बास ने सत्ता संभाली, नाम बदल गए लेकिन ज़ुल्म की प्रवृत्ति बनी रही। अहलेबैत (अ) पर अत्याचारों का सिलसिला जारी रहा और हक़ को दबाने तथा दीन को राजनीति का उपकरण बनाने की प्रवृत्ति कायम रही।

इसी कारण यज़ीद, हिशाम, मंसूर, हारून, मुतवक्किल और मामून के बीच यद्यपि समय का अंतर है, लेकिन ज़ुल्म, तानाशाही और सत्ता-प्रेम की दृष्टि से उनकी वास्तविकता एक जैसी है।

जिस तरह अहलेबैत (अ) का नूर एक है, उसी तरह बातिल की हकीकत भी एक है, भले ही उसके चेहरे और नाम बदलते रहते हैं।

हक़ और बातिल का संघर्ष: व्यक्तियों का नहीं, दो सभ्यताओं की जंग

कर्बला वास्तव में दो व्यक्तियों के बीच की लड़ाई नहीं थी, बल्कि दो सभ्यताओं और दो विचारधाराओं के बीच निर्णायक संघर्ष था।

एक ओर वह स्कूल ऑफ थॉट था जो नबूवत, न्याय, नैतिकता, मानव गरिमा और अल्लाह की रज़ा का प्रतिनिधित्व करता था, और दूसरी ओर वह सत्ता थी जो दीन को शासन की रक्षा का साधन बनाना और उम्मत को अपनी इच्छाओं का गुलाम बनाना चाहती थी।

इसलिए इमाम हुसैन (अ) का बैअत से इनकार कोई राजनीतिक मतभेद नहीं था, बल्कि दीन और सत्ता, न्याय और दमन, हक़ और बातिल के बीच स्पष्ट रेखा खींचने का नाम था।

बनी उमय्या और बनी अब्बास: दो नाम, एक वास्तविकता

इतिहास का एक महत्वपूर्ण सबक यह है कि ज़ुल्म हमेशा एक ही रूप में सामने नहीं आता।

बनी उमय्या ने अहलेबैत (अ) के खिलाफ तलवार उठाई, जबकि बनी अब्बास ने कभी-कभी अहलेबैत की मुहब्बत के नारों के माध्यम से सत्ता हासिल की, लेकिन जब सत्ता उनके हाथ में आई तो वही ज़ुल्म, वही दमन और वही तानाशाही एक नए रूप में सामने आई।

इसलिए अपराध और अत्याचार की दृष्टि से यज़ीद और मुतवक्किल, हिशाम और मंसूर, हारून और मामून में मूलभूत अंतर नहीं है, क्योंकि बातिल की असल हकीकत सत्ता-परस्ती और हक़ से दुश्मनी है, न कि केवल किसी परिवार या समय का नाम।

आधुनिक युग में “मिस्लहु” के उदाहरण

इमाम हुसैन (अ) का संदेश केवल पहली सदी हिजरी तक सीमित नहीं है। हर युग में जब दीन को सत्ता का साधन बनाया जाए, जब ज़ुल्म को कानून का नाम दिया जाए, जब हक़ की आवाज़ को दबाया जाए, जब इंसानी गरिमा को कुचला जाए, जब स्वार्थ को सिद्धांतों पर प्राथमिकता दी जाए, वहाँ यज़ीदियत किसी न किसी रूप में मौजूद रहती है।

इसी तरह हर दौर में वे आवाज़ें भी मौजूद रहती हैं जो सम्मान, स्वतंत्रता, न्याय और हक़ की रक्षा के लिए कुर्बानी देने को तैयार होती हैं, और यही हुसैनी सोच का सिलसिला है।

इसलिए “मिस्ली ला युबायेओ मिस्लहु” केवल एक ऐतिहासिक वाक्य नहीं, बल्कि शासन की वैधता, धार्मिक नेतृत्व, मानव गरिमा और ज़ुल्म के खिलाफ प्रतिरोध का एक स्थायी मानक है।

यह घोषणा हर युग के इंसान को यह संदेश देती है कि बातिल भले ही शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन हक़ कभी उसके सामने सिर नहीं झुकाता, क्योंकि हुसैन जैसा व्यक्ति यज़ीद जैसे व्यक्ति की बैअत नहीं कर सकता।

तीसरा अध्याय

यदि कर्बला न होता तो क्या इमाम हुसैनؑ यज़ीद की बैअत कर लेते?

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु; एक अस्थायी निर्णय या एक शाश्वत सिद्धांत?

कर्बला की घटना के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला न जाते, या परिस्थितियाँ किसी और दिशा में विकसित होतीं, तो क्या आपؑ यज़ीद बिन मुआविया की बैअत स्वीकार कर लेते? क्या बैअत से इनकार केवल एक अस्थायी, राजनीतिक और विशेष परिस्थितियों का परिणाम था, या यह एक सिद्धांतात्मक, आस्थागत और समय-स्थान से परे दृष्टिकोण था?

इस प्रश्न का उत्तर स्वयं इमाम हुसैनؑ के शब्दों में निहित है।

इमामؑ ने यह नहीं कहा कि “मैं उस समय यज़ीद की बैअत नहीं करूँगा” या “वर्तमान परिस्थितियों में उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं करता”, बल्कि आपने एक सर्वव्यापी और स्थायी सिद्धांत प्रस्तुत किया:

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु

अर्थात यह मामला किसी विशेष समय, स्थान या राजनीतिक परिस्थिति का नहीं, बल्कि दो परस्पर विरोधी वास्तविकताओं का है। जैसे प्रकाश और अंधकार एक साथ नहीं हो सकते, वैसे ही इमामत और भ्रष्टाचार, मार्गदर्शन और पथभ्रष्टता, सत्य और असत्य के बीच समझौता संभव नहीं है।

बैअत से इनकार; भूगोल नहीं, बल्कि आस्था और अंतरात्मा का प्रश्न

कुछ लोग यह समझते हैं कि कर्बला ने इमाम हुसैनؑ को उस मार्ग पर पहुँचा दिया कि आपने यज़ीद के विरुद्ध आंदोलन किया, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। कर्बला बैअत से इनकार का कारण नहीं थी, बल्कि बैअत से इनकार स्वयं कर्बला का कारण बना।

अर्थात पहले एक सिद्धांत मौजूद था और फिर बलिदान हुआ; पहले एक दृष्टिकोण था और बाद में आशूरा घटित हुआ। यदि इमाम हुसैनؑ मदीना में रहते, मक्का में ठहरते या दुनिया के किसी भी भाग में होते, तब भी मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु की वास्तविकता नहीं बदलती।

इसलिए कर्बला केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक विचारधारा है, और आशूरा केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक शाश्वत दृष्टिकोण का नाम है।

यदि अमीरुल मोमिनीनؑ या इमाम हसनؑ होते?

यहाँ एक और महत्वपूर्ण बिंदु ध्यान देने योग्य है। इमाम हुसैनؑ ने यह नहीं कहा: अना ला योबायेओ मिस्लहु बल्कि कहा: मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु।

इस कथन में एक गहरा रहस्य छिपा है।

मानो इमाम हुसैनؑ केवल अपनी व्यक्तिगत बात नहीं कर रहे, बल्कि उस दिव्य और नूरानी शृंखला का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिसे कुरआन ने “अहले बैत” कहा और पैग़म्बर मुहम्मद (सः ने मार्गदर्शन का केंद्र बताया।

इस दृष्टि से यदि अमीरुल मोमिनीन अलीؑ, इमाम हसन अल-मुज्तबाؑ, इमाम ज़ैनुल आबिदीनؑ, इमाम बाक़िरؑ या अन्य मासूम इमाम भी ऐसी परिस्थितियों से गुजरते, तो उनका दृष्टिकोण भी यही होता, क्योंकि उनकी वास्तविकता एक है, उनका ज्ञान एक है, उनका उद्देश्य एक है और उनकी रज़ा केवल अल्लाह की रज़ा है।

अतः मिस्ली से अभिप्राय केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अहले बैत की एकीकृत वास्तविकता है, और मिस्लहु से अभिप्राय केवल यज़ीद नहीं, बल्कि हर वह व्यवस्था है जो फिस्क, ज़ुल्म, धर्म की विकृति और तानाशाही पर आधारित हो।

इमाम हसनؑ का सुलह-नामा और इमाम हुसैनؑ का आंदोलन

कुछ लोग इमाम हसनؑ की सुलह और इमाम हुसैनؑ के आंदोलन को एक-दूसरे के विरोधी मानते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों का उद्देश्य एक ही था।

इमाम हसनؑ ने सत्य की रक्षा के लिए सुलह को माध्यम बनाया, और इमाम हुसैनؑ ने उसी सत्य की रक्षा के लिए शहादत को अपनाया।

सुलह और आंदोलन दो अलग-अलग तरीके हो सकते हैं, लेकिन अहले बैतؑ का लक्ष्य हमेशा एक ही रहा है।

इसीलिए यदि इमाम हसनؑ कर्बला में होते तो वही करते जो इमाम हुसैनؑ ने किया, और यदि इमाम हुसैनؑ उन परिस्थितियों का सामना करते जिनका सामना इमाम हसनؑ ने किया था, तो वे भी वही निर्णय लेते जो इमाम हसनؑ ने लिया था।

अंतर परिस्थितियों में था, उद्देश्य में नहीं।

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु; एक शाश्वत मानक

इस कथन का वास्तविक अर्थ यह है कि सत्य असत्य को वैधता नहीं दे सकता; इमामत गुमराही के सामने सिर नहीं झुका सकती; और प्रकाश अंधकार के साथ मिल नहीं सकता।

इसीलिए इमाम हुसैनؑ का बैअत से इनकार कोई अस्थायी राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि एक शाश्वत मानक की घोषणा थी, ताकि क़यामत तक आने वाले लोग समझ सकें कि सिद्धांतों की बलि समझौतों पर नहीं दी जाती और सम्मान को अपमान के बदले नहीं बेचा जाता।

इसलिए यदि कर्बला न भी होती, यदि आशूरा का दिन न आता, यदि नीनवा की भूमि न होती, तब भी हुसैनؑ, हुसैनؑ ही रहते और यज़ीद, यज़ीद ही रहता, और मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु का शाश्वत संदेश अपनी पूरी शक्ति के साथ कायम रहता।

क्योंकि आशूरा कोई घटना नहीं, बल्कि एक सत्य है; और कर्बला कोई भूमि नहीं, बल्कि मानव अंतरात्मा की शाश्वत पुकार है।

चौथा अध्याय

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु; शासन की वैधता, अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध और आज के समय में हुसैनी विचार

कर्बला का सबसे बड़ा संदेश केवल यह नहीं है कि इमाम हुसैनؑ ने यज़ीद की बैअत से इनकार किया, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि शासन और सत्ता की वैधता का मानदंड क्या है? क्या केवल शक्ति, वंश, बहुमत या प्रभुत्व किसी शासन को सत्य और असत्य का मानक बना सकते हैं, या इसके लिए न्याय, परहेज़गारी, सत्यप्रियता और ईश्वरीय मूल्य आवश्यक हैं?

इमाम हुसैनؑ के दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि इस्लाम में हर शक्ति वैध नहीं होती और हर शासन आज्ञापालन योग्य नहीं होता। यदि सत्ता अन्याय, पाप, धर्म के विकृतिकरण, मानव गरिमा के अपमान और अधिकारों के हनन का माध्यम बन जाए, तो उसकी आज्ञा मानना धर्म नहीं बल्कि अन्याय को वैधता देना है।

इसीलिए इमाम हुसैनؑ ने यज़ीद के सामने केवल अपनी व्यक्तिगत पहचान नहीं रखी, बल्कि अहले बैत-ए-नुबुव्वत और ज्ञान के स्रोत (मादिन-ए-रिसालत) को प्रस्तुत किया, ताकि उम्मत समझ सके कि शासन की वैधता तलवार, वंश या राजनीतिक प्रभुत्व से नहीं बल्कि सत्य, न्याय और ईश्वरीय मूल्यों से जुड़ी होती है।

बैअत; केवल राजनीतिक समझौता नहीं, बल्कि वैचारिक और नैतिक समर्थन है

इमाम हुसैनؑ के अनुसार बैअत केवल हाथ पर हाथ रखने का नाम नहीं था, बल्कि एक व्यवस्था, एक विचारधारा और एक जीवन-शैली की पुष्टि का नाम था। यज़ीद की बैअत का अर्थ केवल किसी व्यक्ति की सत्ता को स्वीकार करना नहीं था, बल्कि फिस्क (पापाचार), अन्याय, धर्म के विकृतिकरण और तानाशाही को वैधता प्रदान करना था।

इसीलिए इमामؑ ने अपने प्राणों की कुर्बानी स्वीकार कर ली, लेकिन असत्य को वैधता देने के लिए तैयार नहीं हुए।

हर दौर का यज़ीद और हर दौर का हुसैन

यज़ीद एक व्यक्ति था, लेकिन यज़ीदियत एक विचारधारा है; और हुसैनؑ एक व्यक्तित्व हैं, लेकिन हुसैनियत एक स्कूल है।

जहाँ अन्याय है, वहाँ यज़ीदियत है।

जहाँ सत्य के लिए बलिदान है, वहाँ हुसैनियत है।

जहाँ अंतरात्मा की बिक्री है, वहाँ यज़ीदियत है।

जहाँ सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा है, वहाँ हुसैनियत है।

इसीलिए आशूरा केवल 61 हिजरी की घटना नहीं, बल्कि मानव अंतरात्मा के सतत संघर्ष का नाम है।

अज़ादारी का वास्तविक संदेश

हालाँकि हुसैनؑ के आँसू, मजलिसें और शिया प्रतीक ईमान और प्रेम की महान निशानियाँ हैं, लेकिन उनका वास्तविक उद्देश्य केवल रोना नहीं है, बल्कि हुसैनी चेतना, अन्याय से घृणा, सत्य से जुड़ाव, समाज सुधार और मानव गरिमा का पुनर्जागरण है।

अज़ादारी, मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु के व्यावहारिक संदेश को पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित करने का नाम है।

पाँचवाँ अध्याय

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु और ग़ैबत के दौर में उम्मत की ज़िम्मेदारियाँ

आशूरा; एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि एक जीवित चेतना

यदि मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु केवल 61 हिजरी का एक राजनीतिक बयान होता, तो इसकी हैसियत केवल एक ऐतिहासिक घटना जितनी होती, लेकिन चूँकि यह सत्य और असत्य, प्रकाश और अंधकार, न्याय और तानाशाही, तथा मार्गदर्शन और पथभ्रष्टता के बीच एक स्थायी विभाजन रेखा है, इसलिए इसका संदेश हर समय और हर पीढ़ी के लिए जीवित और प्रभावी है।

इमाम हुसैनؑ ने केवल एक अत्याचारी शासक की बैअत से इनकार नहीं किया, बल्कि उम्मत को यह चेतना दी कि असत्य को वैधता देना, अन्याय के सामने चुप रहना और निजी स्वार्थों के लिए सत्य का सौदा करना एक ईमानदार और विवेकशील इंसान के योग्य नहीं है।

ग़ैबत का दौर और हुसैनी ज़िम्मेदारी

आज यद्यपि इमाम-ए-मासूमؑ हमारी आँखों से ओझल हैं, लेकिन उनका संदेश, उनकी सीरत और उनकी शिक्षाएँ उम्मत के मार्गदर्शन के लिए मौजूद हैं। ग़ैबत के दौर में मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु का अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति हथियार उठाए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि उम्मत अपनी वैचारिक, आस्थागत, नैतिक और सामाजिक पहचान को सुरक्षित रखे और हर उस चीज़ से दूर रहे जो असत्य, अन्याय, अज्ञान और धर्म के विकृतिकरण का माध्यम बने।

हुसैनी सोच का तकाज़ा यह है कि मुसलमान:

• सत्य और असत्य के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित करें।
• अन्याय, भ्रष्टाचार और वैचारिक विचलन के सामने चुप दर्शक न बनें।
• धर्म को सत्ता, पक्षपात और दुनिया-परस्ती का साधन बनाने वालों से सावधान रहें।
• अपनी आने वाली पीढ़ियों में आशूरा की चेतना, अहले-बैतؑ की मोहब्बत और स्वतंत्रता की भावना को स्थानांतरित करें।
• अज़ादारी को केवल भावनात्मक रस्में न मानें, बल्कि इसे समाज सुधार, उम्मत की जागरूकता और धार्मिक मूल्यों के पुनर्जागरण का माध्यम बनाएं।

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु; एक सांस्कृतिक घोषणा-पत्र

इमाम हुसैनؑ का यह कथन केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और सभ्यतागत घोषणा-पत्र है। यह इंसान को सिखाता है कि सिद्धांतों की रक्षा समझौतों से अधिक महत्वपूर्ण है, और आत्म-सम्मान दुनिया के किसी भी भौतिक लाभ से कहीं ऊँचा है।

यह घोषणा मनुष्य को यह समझ देती है कि सत्य का समर्थन और असत्य का विरोध केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कलम, भाषा, विचार, शिक्षा, प्रशिक्षण, संस्कृति और सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है।

निष्कर्ष

इमाम हुसैनؑ का कथन:

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु

वास्तव में अहले-बैत-ए-नबूवत और इमामों के साझा दृष्टिकोण का प्रदर्शन है, जो हर युग में सत्य और असत्य के बीच एक स्पष्ट मानदंड प्रदान करता है।

यह वाक्य किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी व्यक्ति की घोषणा नहीं, बल्कि प्रकाश और अंधकार, न्याय और तानाशाही, मार्गदर्शन और पथभ्रष्टता के बीच एक शाश्वत और असमझौता योग्य सीमा रेखा है।

यदि कर्बला न भी होती, तब भी हुसैनؑ, हुसैनؑ ही रहते और यज़ीद, यज़ीद ही रहता, क्योंकि मामला भूमि और समय का नहीं बल्कि वास्तविकताओं का था।

इसीलिए मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु केवल आशूरा का नारा नहीं, बल्कि क़यामत तक सभी स्वतंत्र, सम्मानित और सत्यनिष्ठ लोगों के लिए एक जीवित संदेश है कि:

असत्य के साथ समझौते से बेहतर है सत्य के साथ बलिदान देना, और अन्याय के सामने झुकने से बेहतर है सम्मान के साथ जीना और सम्मान के साथ मरना।

यही कर्बला का सार है, यही हुसैनؑ का संदेश है, यही अहले-बैतؑ का साझा दृष्टिकोण है, और यही मानवता की वास्तविक स्वतंत्रता का घोषणापत्र है।

समापन

«मिथ्ली ला युबायिउ मिथ्लहु»; कर्बला से क़यामत तक

कर्बला केवल एक भूमि का नाम नहीं है, आशूरा केवल एक दिन का नाम नहीं है, और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है; बल्कि यह हक़ और बातिल, नूर और अंधकार, सम्मान और अपमान तथा हिदायत और गुमराही के बीच एक शाश्वत संघर्ष और स्थायी मापदंड का नाम है।

इमाम हुसैन ने यज़ीद के सामने केवल बैअत से इनकार नहीं किया, बल्कि उम्मत के ज़मीर को जगाया, इतिहास की दिशा बदल दी और मानवता को यह सबक दिया कि ताकत, प्रभुत्व, बहुमत और ज़बरदस्ती कभी भी हक़ और बातिल का मापदंड नहीं बन सकते। हक़, हक़ ही रहता है चाहे वह अकेला ही क्यों न हो, और बातिल, बातिल ही रहता है चाहे उसके पास सत्ता, धन और तलवार ही क्यों न हो।

इसलिए इमाम हुसैन ने यह नहीं कहा: «अना ला योबायेओ यज़ीद», बल्कि कहा: «मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु»

अर्थात हुसैन एक व्यक्ति की हैसियत से नहीं बोल रहे थे, बल्कि नबुवत के वृक्ष, रिसालत के स्रोत, फ़रिश्तों के अवतरण के केंद्र और इमामत की श्रृंखला की नुमाइंदगी करते हुए यह घोषणा कर रहे थे कि नूर कभी अंधकार से समझौता नहीं कर सकता, हक़ कभी बातिल को वैधता नहीं दे सकता और हिदायत वाले कभी गुमराही वालों के सामने झुक नहीं सकते।

अगर कर्बला न भी होती, अगर नीनवा की धरती न होती, अगर आशूरा का दिन न आता, तब भी हुसैन हुसैन ही रहते और यज़ीद यज़ीद ही रहता, क्योंकि यह संघर्ष ज़मीनों का नहीं बल्कि हक़ीक़तों का था; यह लड़ाई व्यक्तियों की नहीं बल्कि विचारों, मूल्यों और सिद्धांतों की थी।

इसीलिए आशूरा समाप्त नहीं हुआ, कर्बला अतीत की कहानी नहीं बनी, और हुसैन का संदेश इतिहास के पन्नों में दफ़्न नहीं हुआ, बल्कि हर दौर में जब भी ज़ुल्म ने सिर उठाया, जब भी धर्म को सत्ता का साधन बनाया गया, जब भी हक़ को स्वार्थों के बाज़ार में बेचने की कोशिश की गई, तब कर्बला ने फिर से मानवता को आवाज़ दी:

«अला वा इन्नद-दाई इब्नद-दाई क़द रकज़ा बैनस्नतैन; बैनस-सिल्लते वज़-ज़िल्ला, व हयहात मिन्नज़-ज़िल्लह»

और इस आवाज़ के साथ मानव अंतरात्मा में हमेशा के लिए यह अमर संदेश अंकित हो गया:

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु

यह हुसैन की आवाज़ है, लेकिन केवल हुसैन की नहीं;

यह रसूलुल्लाह की आवाज़ है;

यह अली मुर्तज़ा की आवाज़ है;

यह हसन मुज्तबा की आवाज़ है;

यह ज़ैनब कुबरा के सब्र की पुकार है;

यह सज्जाद अल-साजिदीन की दुआ का संदेश है;

यह बाक़िर और सादिक़ के ज्ञान का प्रकाश है;

यह तमाम आइम्मा-ए-अहले-बैत और क़ायम आल-ए-मोहम्मद इमाम महदी अलैहिस्सलाम के साझा रुख़ का ऐलान है।

यह हर उस इंसान की आवाज़ है जिसका ज़मीर ज़िंदा है, जिसकी गैरत जागी हुई है, जिसका ईमान जीवित है और जिसके लिए सम्मान, हक़ और इंसानी गरिमा दुनिया के तमाम लाभों से अधिक मूल्यवान हैं।

इसलिए कर्बला का संदेश केवल आँसू बहाना नहीं, बल्कि चेतना प्राप्त करना है; केवल शोक मनाना नहीं, बल्कि ज़ुल्म के खिलाफ जागरूक रहना है; केवल हुसैन से प्रेम का दावा करना नहीं, बल्कि हुसैनी उसूलों पर जीवन जीना है।

क्योंकि हुसैन ने हमें सिखाया है कि:

सिर कटाया जा सकता है, लेकिन ज़मीर बेचा नहीं जा सकता;

जान क़ुर्बान की जा सकती है, लेकिन हक़ को बातिल के हाथ नहीं बेचा जा सकता;

समय के यज़ीद बदल सकते हैं, लेकिन हुसैन का रुख़ नहीं बदलता;

हालात बदल सकते हैं, लेकिन हक़ और बातिल के बीच की सीमा कायम रहती है।

और यही आशूरा का शाश्वत सबक है, यही अहले-बैत का साझा रुख़ है, और यही मानवता की वास्तविक स्वतंत्रता का घोषणापत्र है।

सलाम हो उस हुसैन पर जिसने सम्मान को जीवन दिया;

सलाम हो उस मज़लूम रक्त पर जिसने हक़ को स्थायित्व दिया;

और सलाम हो उस शाश्वत घोषणा पर जिसकी गूंज आज भी समय के गलियारों में सुनी जाती है:

मिस्ली ला योबायेओ मिस्लहु

शबीह-ए-हुसैन, शबीह-ए-यज़ीद की बैअत नहीं कर सकता।

स्रोत

नहजुल बलाग़ा

अल-इरशाद, शेख़ मुफ़ीद

अल-लोहूफ़, सैय्यद इब्न ताऊस

तारीख़ अल-तबरी

अल-फुतूह, इब्न असम कूफ़ी

बिहारुल अनवार, अल्लामा मजलिसी

मकतल अल-हुसैन, ख़्वारज़मी

मनाक़िब आल-ए-अबी तालिब, इब्न शहर आशोब

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